सितारों से भरा आसमान मगर अफताब नज़र नहीं आता,
फूलों से भरी महफ़िल में कोई गुलाब नज़र नहीं आता,
ख्वाब तो देखती है ऑंखें रोज़ नए,
जिसकी ताबीर हो मुमकिन ऐसा ख्वाब नज़र नहीं आता,
अब तो नज़रों की शर्म भी बाकी न रही,
किसी चेहरे पे शर्मो हया का नकाब नज़र नहीं आता..
Thursday, May 13, 2010
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment