Wednesday, June 2, 2010

देखते है

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते है
सो उसके शहर मै कुछ दिन ठहर के दहकते है

सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते है
ये बात है तो बात करके देखते है

सुना है उसके लबों से गुलाब जलते है
सो हम बहार पर इल्जाम धरके देखते है

सुना है उसके बदन की तराश ऐसी है
की फूल अपनी कबाये कुतर के देखते है

रुके तो गर्दिशे उसका तवाफ़ करती है
चले तो उसको जमाने ठहर के देखते है

किसे नसीब कि पैरहन उसे देखते है
कभी-कभी दरो दिवार घर के देखते है

2 comments:

Ra said...

सुन्दर लिखा है ,बधाई !!!

vivek said...
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