पहले कितने अच्छे थे
छोटे छोटे बच्चे थे
जी कहता वो करते थे
नहीं किसी से डरते थे
जीवन की खुशियों से हर पल
मिलते और बिछड़ते थे
दो आंसू जो टपके तो
दो सौ लोग पकड़ते थे
मन कहता है फिर से मैं
छोटा बच्चा बन जाऊँ
तुतली सी भाषा में मैं
फिर से अ बी क गाऊँ
पापा फिर चिल्लाएं तो
माँ के आंचल में छिप जाऊँ
जी भर कर फिर से सोऊं
जब चाहे मैं तब जागूँ
फिर दीदी की चोटी
खींच खींच के मैं भागूं
अब जो खुद को देखूं तो
हूँ चार महीने का मेहमान
फिर ख़्वाबों मैं ही मिलेंगे
माँ के हाथों के पकवान.......................
और आब
Monday, July 5, 2010
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