नर्म ठंडी फजा जब हुई शाम की
नींद सूरज ने ली चाँद के नाम की
वादियों मई कही बंसी बजने लगी
रात दुल्हन बनी और सजने लगी
मस्त झोको ने कलियों को हलके से छुवा
आसमा आके टहनी पे शबनम हुआ
पत्ते पत्ते से झरने लगी चांदनी
रात बिछुवा हुई और महकने लगी
साए पेड़ो के तले सो गए
दो परिंदे थे मस्त एक बदन हो गए
लम्हा लम्हा है जुगनू मै लिपटा हुआ
खुस्बुओ से मुअतेर की उड़ता रहा
मिसर :- ऐ-मीर पग्दंदियो हो गई
सीपिया आई साहिल पे खो गई
रूह के चाँद तक चांदनी रात है
कितना पुरकेफ़ मंजेर.मिरी जात है
रख के पलकों पे मंजेर सो जाऊं मै
एक मख्सुर वादी मै खो जाऊं मैं
नींद खुलते ही धूपों से घिर जाऊँगा
कडवी दुनिया मै इक बार फिर आऊंगा
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