Monday, September 6, 2010

एक नज्म

नर्म ठंडी फजा जब हुई शाम की
नींद सूरज ने ली चाँद के नाम की

वादियों मई कही बंसी बजने लगी
रात दुल्हन बनी और सजने लगी

मस्त झोको ने कलियों को हलके से छुवा
आसमा आके टहनी पे शबनम हुआ

पत्ते पत्ते से झरने लगी चांदनी
रात बिछुवा हुई और महकने लगी

साए पेड़ो के तले सो गए
दो परिंदे थे मस्त एक बदन हो गए

लम्हा लम्हा है जुगनू मै लिपटा हुआ
खुस्बुओ से मुअतेर की उड़ता रहा

मिसर :- ऐ-मीर पग्दंदियो हो गई
सीपिया आई साहिल पे खो गई

रूह के चाँद तक चांदनी रात है
कितना पुरकेफ़ मंजेर.मिरी जात है

रख के पलकों पे मंजेर सो जाऊं मै
एक मख्सुर वादी मै खो जाऊं मैं

नींद खुलते ही धूपों से घिर जाऊँगा
कडवी दुनिया मै इक बार फिर आऊंगा

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